उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने संविधान दिवस पर संविधान सदन में संबोधित किया, भारत के विकास और लोकतांत्रिक परंपराओं पर जोर दिया
उपराष्ट्रपति ने संविधान दिवस के अवसर पर संविधान सदन में भारत के संविधान के महत्व पर प्रकाश डाला, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और सामाजिक न्याय के प्रति देश की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने आज संविधान दिवस के अवसर पर संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में एक स्मृति समारोह को संबोधित किया। इस दौरान, उन्होंने भारतीय संविधान के महत्व, इसके मूल्यों और सिद्धांतों को रेखांकित किया और देश के लोकतांत्रिक विकास में संविधान की भूमिका पर जोर दिया।
संविधान: स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक
उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि भारतीय संविधान, स्वतंत्रता संग्राम में शामिल लाखों महान नेताओं और नागरिकों की सामूहिक बुद्धिमत्ता और बलिदान का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि संविधान की स्थापना ने भारत को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में उभरने की बुनियाद रखी, जिससे करोड़ों भारतीयों की आशाओं और आकांक्षाओं को आकार मिला।
समाज के हर वर्ग के लिए न्याय
उपराष्ट्रपति ने संविधान की प्रस्तावना में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों का उल्लेख करते हुए बताया कि यह आदर्श समाज के सभी वर्गों के लिए समुचित स्थान सुनिश्चित करते हैं। उन्होंने विशेष रूप से अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों के सामाजिक न्याय और आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में संविधान की भूमिका की सराहना की।
भारत की लोकतांत्रिक परंपरा
श्री राधाकृष्णन ने भारत के ऐतिहासिक लोकतांत्रिक उदाहरणों का उल्लेख किया, जैसे कि वैशाली और चोल शासकों की कुदावोलाई व्यवस्था, यह दर्शाते हुए कि भारत सदियों से लोकतंत्र का जनक रहा है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर और बिहार में हाल के चुनावों में भारी मतदान लोकतांत्रिक प्रक्रिया में नागरिकों के अडिग विश्वास को दर्शाता है।
भारत की सामाजिक और आर्थिक प्रगति
उपराष्ट्रपति ने कहा कि पिछले दशक में भारत ने कई महत्वपूर्ण विकास संकेतक हासिल किए हैं, जिनमें 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर लाना और 100 करोड़ से अधिक लोगों को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का हिस्सा बनाना शामिल है। उन्होंने इसे ‘असंभव को संभव बनाना’ करार दिया।
महिलाओं और आदिवासी समुदायों का योगदान
संविधान सभा की महिला सदस्यों के योगदान को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए, उपराष्ट्रपति ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 की सराहना की, जिसे महिलाओं के राष्ट्र निर्माण में समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए पारित किया गया है। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम और संविधान सभा में आदिवासी समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका का भी उल्लेख किया।
संविधान का भविष्य
अपने संबोधन के अंत में, उपराष्ट्रपति ने देशवासियों से संविधान के मूल्यों और सिद्धांतों को बनाए रखने का संकल्प लेने का आह्वान किया। उन्होंने 2047 तक एक सुदृढ़, समावेशी और समृद्ध भारत के निर्माण के लिए मिलकर काम करने की अपील की, ताकि भारत के विकास की यात्रा को और अधिक सशक्त किया जा सके।
उपराष्ट्रपति ने यह भी जोर दिया कि राष्ट्र निर्माण में प्रत्येक व्यक्ति का सजग योगदान आवश्यक है, और आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग करके भारत के महत्वाकांक्षी विकास लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।