Select Page

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने जेएनयू के 9वें दीक्षांत समारोह को संबोधित किया; युवाओं से बौद्धिक ईमानदारी और राष्ट्र निर्माण की अपील

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने जेएनयू के 9वें दीक्षांत समारोह को संबोधित किया; युवाओं से बौद्धिक ईमानदारी और राष्ट्र निर्माण की अपील

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने जेएनयू के 9वें दीक्षांत समारोह में युवाओं से बौद्धिक ईमानदारी, चरित्र निर्माण और राष्ट्र निर्माण में योगदान की अपील की।

उपराष्ट्रपति श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने आज जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के 9वें दीक्षांत समारोह को संबोधित किया और स्नातक छात्रों को बधाई दी। अपने संबोधन में उन्होंने युवाओं से अपने ज्ञान और कौशल का उपयोग राष्ट्र सेवा में करने का आग्रह किया।

उपराष्ट्रपति ने स्वामी विवेकानंद के उपदेशों का हवाला देते हुए कहा कि शिक्षा केवल डिग्री तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसका उद्देश्य चरित्र निर्माण, बुद्धि का विकास और आत्मनिर्भरता होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सही शिक्षा और प्रशिक्षण भारत के युवाओं को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को साकार करने में सक्षम बनाएगा।

भारतीय ज्ञान परंपरा और शिक्षा का महत्व

उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने भारत की ज्ञान-संस्कृति और प्राचीन शिक्षा केंद्रों जैसे नालंदा और तक्षशिला का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उपनिषद, भगवद गीता, कौटिल्य के अर्थशास्त्र और तिरुक्कुरल जैसी प्राचीन रचनाएँ शिक्षा को सामाजिक और नैतिक जीवन के केंद्र में रखती हैं। उनका कहना था कि सच्ची शिक्षा चरित्र निर्माण और नैतिक आचरण पर आधारित होती है।

आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक मूल्यों का संतुलन

उपराष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक मूल्यों का साथ-साथ विकास होना चाहिए। जेएनयू के लोकतांत्रिक और बहस-प्रधान वातावरण का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि बहस, चर्चा और असहमति स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि निर्णय लेने के बाद उसका कार्यान्वयन सुनिश्चित करने में सभी का सहयोग होना चाहिए।

समानता, सामाजिक समावेश और भाषाओं का संवर्धन

उपराष्ट्रपति ने जेएनयू के समावेशी वातावरण, छात्र प्रवेश और संकाय भर्ती में समानता, तथा संस्कृत और भारतीय अध्ययन, हिंदू, जैन और बौद्ध अध्ययन केंद्रों की स्थापना की सराहना की। उन्होंने तमिल अध्ययन और असमिया, ओडिया, मराठी और कन्नड़ जैसी मातृभाषाओं में पाठ्यक्रमों के माध्यम से भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन पर भी जोर दिया।

छात्रों के लिए तीन प्रमुख उत्तरदायित्व

उपराष्ट्रपति ने स्नातकों से तीन उत्तरदायित्व निभाने का आग्रह किया:

  1. सत्य की खोज में बौद्धिक ईमानदारी बनाए रखना।

  2. सामाजिक असमानताओं को कम करने के लिए प्रयास करना।

  3. राष्ट्रीय विकास में सक्रिय योगदान देना।

उन्होंने छात्रों से संवैधानिक मूल्यों, भारत की सभ्यतागत नैतिकता का पालन करने और माता-पिता एवं शिक्षकों का सम्मान करने का आह्वान किया। अपने भाषण का समापन करते हुए उन्होंने छात्रों को उनके भविष्य के प्रयासों में सफलता की शुभकामनाएं दी और भारत की एकता और सामूहिक प्रगति पर जोर दिया।

इस अवसर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, जेएनयू के कुलाधिपति कंवल सिबल, कुलपति प्रो. शांतिश्री धुलिपुडी पंडित, वरिष्ठ अधिकारी, संकाय सदस्य, स्नातक छात्र और उनके परिवार उपस्थित थे।

About The Author

Leave a reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *